Mirza Ghalib – Bazme shehanshah mein ashar ka daftar khula
बज़मे-शाहनशाह में अशआर का दफ़तर खुला
रखियो या रब! यह दरे-ग़ंजीना-ए-गौहर खुला
शब हुयी फिर अंजुमे-रख़शन्दा का मंज़र खुला
इस तकल्लुफ़ से कि गोया बुतकदे का दर खुला
गरचे हूं दीवाना, पर कयों दोसत का खाऊं फ़रेब
आसतीं में दशना पिनहां हाथ में नशतर खुला
गो न समझूं उसकी बातें, गो न पाऊं उसका भेद
पर यह क्या कम है कि मुझसे वो परी-पैकर खुला
है ख़याले-हुसन में हुसने-अमल का सा ख़याल
ख़ुलद का इक दर है मेरी गोर के अन्दर खुला
मुंह न खुलने पर वो आलम है कि देखा ही नहीं
ज़ुल्फ़ से बढकर नकाब उस शोख़ के मुंह पर खुला
दर पे रहने को कहा और कह के कैसा फिर गया
जितने अरसे में मेरा लिपटा हुआ बिसतर खुला
कयों अंधेरी है शबे-ग़म ? है बलायों का नुज़ूल
आज उधर ही को रहेगा दीदा-ए-अख़तर खुला
क्या रहूं ग़ुरबत में ख़ुश ? जब हो हवादिस का यह हाल
नामा लाता है वतन से नामाबर अकसर खुला
उसकी उम्मत में हूं मैं, मेरे रहें कयों काम बन्द
वासते जिस शह के ‘ग़ालिब’ गुम्बदे-बे-दर खुला