Mirza Ghalib – Fariyad ki koi lae nahi hai
फ़रियाद की कोई लै नहीं है
नाला पाबन्द-ए-नै नहीं है
कयूं बोते हैं बाग़-बान तूम्बे
गर बाग़ गदा-ए-मै नहीं है
हर-चन्द हर एक शै में तू है
पर तुझ-सी कोई शै नहीं है
हां, खाययो मत फ़रेब-ए-हसती
हर-चन्द कहें कि ”है”, नहीं है
शादी से गुज़र, कि ग़म न रहवे
उरदी जो न हो, तो दै नहीं है
कयूं रद्द-ए-कदह करे है, ज़ाहद
मै है ये, मगस की कै नहीं है
हसती है न कुछ अदम है ”ग़ालिब”
आख़िर तू क्या है, ए ”नहीं” है