Mirza Ghalib – Hum se khul jao bewaqte mein parasti ek din
हम से खुल जायो ब-वकते-मै-परसती एक दिन
वरना हम छेड़ेंगे रख कर उज़र-ए-मसती एक दिन
ग़र्रा-ए औज-ए-बिना-ए-आलम-ए-इमकां न हो
इस बुलन्दी के नसीबों में है पसती एक दिन
करज़ की पीते थे मै लेकिन समझते थे कि हां
रंग लावेगी हमारी फ़ाका-मसती एक दिन
नग़मा-हाए-ग़म को भी ऐ दिल ग़नीमत जानिये
बे-सदा हो जाएगा यह साज़-ए-हसती एक दिन
धौल-धप्पा उस सरापा-नाज़ का शेवा नहीं
हम ही कर बैठे थे ग़ालिब पेश-दसती एक दिन