Mirza Ghalib – Aabroo kya khaak uss gul ki
आबरू क्या ख़ाक उस गुल की कि गुलशन में नहीं
है गरेबां नंग-ए-पैराहन जो दामन में नहीं
ज़ोफ़ से ऐ गिरिया, कुछ बाकी मेरे तन में नहीं
रंग हो कर उड़ गया, जो ख़ूं कि दामन में नहीं
हो गए हैं जमा अज़्ज़ा-ए-निगाहे-आफ़ताब
ज़र्रे उसके घर की दीवारों के रौज़न में नहीं
क्या कहूं तारीकी-ए-ज़िन्दान-ए-ग़म अंधेर है
पुम्बा नूर-व-सुबह से कम जिसके रौज़न में नहीं
रौनक-ए-हसती है इशके-ख़ाना-वीरां-साज़ से
अंजुमन बे-शमय है, गर बरक ख़िरमन में नहीं
ज़खम सिलवाने से मुझ पर चाराजोयी का है ताअन
ग़ैर समझा है कि लज़्ज़त ज़ख़्मे-सोज़न में नहीं
बस कि हैं हम इक बहारे-नाज़ के मारे हुए
जलवा-ए-गुल के सिवा गरद अपने मदफ़न में नहीं
कतरा-कतरा इक हयूला है, नए नासूर का
ख़ूं भी ज़ौके-दर्द से फ़ारिग़ मेरे तन में नहीं
ले गई साकी की नख़वत कुलज़ुम-आशामी मेरी
मौजे-मय की आज रग मीना की गरदन में नहीं
हो फ़िशारे-ज़ोफ़ में क्या नातवानी की नुमूद
कद के झुकने की भी गुंजायश मेरे तन में नहीं
थी वतन में शान क्या ग़ालिब, कि हो ग़ुरबत में कद्र
बे-तकललुफ़ हूं वो मुशते-ख़स कि गुलख़न में नहीं