Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Huyi taakheer toh kuch bayse takheer bhi tha


हुयी ताख़ीर तो कुछ बायसे-ताख़ीर भी था
आप आते थे, मगर कोई इनांगीर भी था

तुम से बेजा है मुझे अपनी तबाही का गिला
उसमें कुछ शायबा-ए-ख़ूबी-ए-तकदीर भी था

तू मुझे भूल गया हो, तो पता बतला दूं
कभी फ़ितराक में तेरे कोई नख़चीर भी था

कैद में है तेरे वहशी को वही ज़ुल्फ़ की याद
हां कुछ इक रंज-ए-गिरांबारी-ए-ज़ंजीर भी था

बिजली इक कौंध गई आंखों के आगे, तो क्या
बात करते, कि मैं लब-तिशना-ए-तकरीर भी था

यूसुफ़ उस को कहूं, और कुछ न कहे, ख़ैर हुई
गर बिगड़ बैठे तो मैं लायक-ए-तअज़ीर भी था

देखकर ग़ैर को हो कयों न कलेजा ठंडा
नाला करता था वले, तालिब-ए-तासीर भी था

पेशे में ऐब नहीं, रखिये न फ़रहाद को नाम
हम ही आशुफ़ता-सरों में वो जवां-मीर भी था

हम थे मरने को खड़े, पास न आया न सही
आखिर उस शोख़ के तरकश में कोई तीर भी था

पकड़े जाते हैं फ़रिशतों के लिखे पर नाहक
आदमी कोई हमारा दमे-तहरीर भी था

रेख़ते के तुम्हीं उसताद नहीं हो ‘ग़ालिब’
कहते हैं अगले ज़माने में कोई ‘मीर’ भी था