Mirza Ghalib – Koi na aaya
जुज़ कैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार
सहरा मगर ब-तंगी-ए-चशम-ए-हसूद था
आशुफ़तगी ने नक्श-ए-सवैदा किया दुरुसत
ज़ाहर हुआ कि दाग़ का सरमाया दूद था
था ख़वाब में ख़याल को तुझसे मुआमला
जब आंख खुल गई न ज़ियां था न सूद था
लेता हूं मकतबे-ग़मे-दिल में सबक हनूज़
लेकिन यही कि रफ़त गया और बूद था
ढांपा कफ़न ने दाग़े-अयूबे-बरहनगी
मैं वरना हर लिबास में नंगे-वजूद था
तेशे बग़ैर मर न सका कोहकन ”असद”
सरगशता-ए-ख़ुमारे-रुसूम-ओ-कयूद था
पाठ भेद
आलम जहां ब-अरज़-ए-बिसात-ए वजूद था
जूं सुबह चाक-ए-जेब मुझे तार-ओ-पूद था
बाज़ी-ख़ुर-ए-फ़रेब है अहल-ए-नज़र का ज़ौक
हंगामा गरम-ए-हैरत-ए-बूद-ओ-नुमूद था
आलम तिलिसम-ए-शहर-ए-ख़ामोशां है सर-ब-सर
या मैं ग़रीब-ए-किशवर-ए-गुफ़त-ओ-सुनूद था
तंगी रफ़ीक-ए-राह थी अदम या वजूद था
मेरा सफ़र ब-ताला-ए-चशम-ए-हसूद था
तू यक-जहां कुमाश-ए-हवस जमय कर कि मैं
हैरत मता-ए-आलम-ए-नुकसान-ओ-सूद था
गरदिश-मुहीत-ए-ज़ुलम रहा जिस कदर फ़लक
मैं पा-एमाल-ए-ग़मज़ा-ए-चशम-ए-कबूद था
पूछा था गरचे यार ने अहवाल-ए-दिल मगर
किस को दिमाग़-ए-मिन्नत-ए-गुफ़त-ओ-शुनूद था
ख़ुर शबनम-आशना ना हुआ वरना मैं ‘असद’
सर-ता-कदम गुज़ारिश-ए- ज़ौक-ए-सुजूद था