Hindi Poetry

Javed Akhtar – Kis liye keejay bazm araayi


किसलिए कीजे बज़्म-आराई
पुरसुकूँ हो गई है तन्हाई

फिर ख़मोशी ने साज़ छेड़ा है
फिर ख़यालात ने ली अंगड़ाई

यूँ सुकूँ-आशना हुए लम्हे
बूँद में जैसे आए गहराई

इक से इक वाक़आ हुआ लेकिन
न गई तेरे ग़म की यकताई

कोई शिकवा न ग़म, न कोई याद
बैठे-बैठे बस आँख भर आई

ढलकी शानों से हर यक़ीं की क़बा
ज़िंदगी ले रही है अंगड़ाई