Hindi Poetry

Gulzar – Yudh


युद्ध

सूरज के ज़ख्मों से रिसता लाल लहू
दूर उफ़क से बहते-बहते इस साहिल तक आ पहुँचा है
किरणे मिट्टी फाँक रही है
साये अपना पिंड छुड़ाकर भाग रहे है
थोड़ी देर में लहरायेगा चाँद का परचम
रात ने फिर रण जीत लिया है
आज का दिन फिर हार गया हूँ…..