Hindi Poetry Gulzar – Yudh December 21, 2020 rhymecloud युद्ध सूरज के ज़ख्मों से रिसता लाल लहू दूर उफ़क से बहते-बहते इस साहिल तक आ पहुँचा है किरणे मिट्टी फाँक रही है साये अपना पिंड छुड़ाकर भाग रहे है थोड़ी देर में लहरायेगा चाँद का परचम रात ने फिर रण जीत लिया है आज का दिन फिर हार गया हूँ…..