Amir Khusro – Pardesi balam dhan akeli

परदेसी बालम धन अकेली मेरा बिदेसी घर आवना।
बिर का दुख बहुत कठिन है प्रीतम अब आजावना।
इस पार जमुना उस पार गंगा बीच चंदन का पेड़ ना।

इस पेड़ ऊपर कागा बोले कागा का बचन सुहावना।

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