Faiz Ahmed Faiz – Aur fer ik din yun khizaa aa gyi
और फिर एक दिन यूँ ख़िज़ाँ आ गई
और फिर इक दिन यूं ख़िज़ां आ गई
आबनूसी तनों के बरहना शजर
सरनिगूं सफ़-ब-सफ़ पेशे-दीवारो-दर
और चारों तरफ़ इनके बिख़रे हुए
ज़रद पत्ते दिलों के सरे-रहगुज़र
जिसने चाहा वो गुज़रा इनहें रौंदकर
और किसी ने ज़रा-सी फ़ुग़ां भी न की
इनकी शाख़ों से ख़वाबो ख़यालों के सब नग़मागर
जिनकी आवाज़ गरदन का फन्दा बनी
जिससे जिस दम वो ना-आशना हो गये
आप ही आप सब ख़ाक में आ गिरे
और सैयाद ने ज़ह कमां भी न की
ऐ ख़ुदा-ए-बहारां ज़रा रहम कर
सारी मुरदा रगों को नुमू बख़श दे
सारे तिशना दिलों को लहू बख़श दे
कोई इक पेड़ फिर लहलहाने लगे
कोई इक नग़मागर चहचहाने लगे
(ज़ह कमां=धनुष चढ़ाना, नुमू=
विकास)
विकास)