Faiz Ahmed Faiz – Chand nikle kisi jaanib teri jobaayi ka
चाँद निकले किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का
चाँद निकले किसी जानिब तेरी ज़ेबाई का
रंग बदले किसी सूरत शबे-तनहाई का
दौलते-लब से फिर ऐ ख़ुसरवे-शीरींदहनाँ
आज अरज़ां हो कोई हर्फ़ शनासाई का
गरमी-ए-इशक से हर अंजुमने-गुलबदनां
तज़किरा छेड़े तिरी पैरहन-आराई का
सहने-गुलशन में कभी ऐ शहे-शमशादकदां
फिर नज़र आये सलीका तिरी रा’नाई का
एक बार और मसीहा-ए-दिले-दिलज़दगां
कोई वा’दा कोई इकरार मसीहाई का
दीदा-ओ-दिल को संभालो कि सरे-शामे-फ़िराक
साज़ो-सामान बहम पहुंचा है रुसवाई का
(ज़ेबाई=सुंदरता, ख़ुसरवे-शीरींदहनाँ=मीठा
बोलने वालों की सरताज, अरज़ां=सस्ता,
शनासाई=जानकारी, अंजुमने-गुलबदनां=फूल
जैसे बदन वालों की महफिल, पैरहन-आराई=
कपड़ों की सजावट, शहे-शमशादकदां=सरू जैसे
कद वालों का सरताज, रा’नाई=सुन्दरता,
मसीहा-ए-दिले-दिलज़दगां=दुखी दिलों का
इलाज करनेवाला)
बोलने वालों की सरताज, अरज़ां=सस्ता,
शनासाई=जानकारी, अंजुमने-गुलबदनां=फूल
जैसे बदन वालों की महफिल, पैरहन-आराई=
कपड़ों की सजावट, शहे-शमशादकदां=सरू जैसे
कद वालों का सरताज, रा’नाई=सुन्दरता,
मसीहा-ए-दिले-दिलज़दगां=दुखी दिलों का
इलाज करनेवाला)