Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Ek shehar aashob ka aagaaz


एक शहर आशोब का आग़ाज़

अब बज़्मे-सुख़न सोहबते-लबसोख़्तगां है
अब हलका-ए-मय ताएफ़-ए-बेतलबां है

घर रहिए तो वीरानी-ए-दिल खाने को आवे
रह चलिए तो हर गाम पे ग़ौग़ा-ए-सगां है

पैवन्दे-रहे-कूचा-ए-ज़र चश्मे-ग़िज़ालां
पाबोसे-हवस अफ़सरे-शमशादकदां है

यां अहले-जुनूं यक-ब-दिगर-दस्तो-गरेबां
वां जैशे-हवस तेग़-ब-कफ़-दरपाये-जां है

अब साहबे-इनसाफ़ है ख़ुद तालिबे-इन्साफ़
मुहर उसकी है, मीज़ान व-दस्ते-दिगरां है

हम सहलतलब कौन-से- फ़रहाद थे, लेकिन
अब शहर में तेरे कोई हम-सा भी कहां है

फरवरी, १९६६

(आशोब का आग़ाज़=दुर्दशा के वर्णन की शुरुआत,
सोहबते-लबसोख़्तगां=जले होंठों वालों की संगत,
हलका-ए-मय=शराबियों की संगत, ताएफ़=राग-
मंडली, ग़ौग़ा-ए-सगां=कुत्तों का कोलाहल, पैवन्दे-
रहे-कूचा-ए-ज़र=धनवानों की गली की टाकी, चश्मे-
ग़िज़ालां=मृग-नैनी पाबोस=पैर चूमना, अफ़सरे-
शमशादकदां=सरू जैसे सीधे कद वाले, यक-ब-
दिगर-दस्तो-गरेबां=एक दूसरे के गरेबां पकड़े, जैश=
लश्कर, तेग़-ब-कफ़-दरपाये-जां=तलवारें हाथ में पकड़े,
जान लेने पर तत्पर, मीज़ान व-दस्ते-दिगरां=इंसाफ़ की
तराज़ू दूसरे के हाथ है)

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