Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Jaise hum-bazm hain fir yaare tehdaar se hum


जैसे हम-बज़्म हैं फिर यारे-तरहदार से हम

जैसे हम-बज़्म हैं फिर यारे-तरहदार से हम
रात मिलते रहे अपने दर-ओ-दीवार से हम

सरख़ुशी में यूं ही सरमस्तो-ग़ज़लख़्वां गुज़रे
कू-ए-कातिल से कभी कूचा-ए-दिलदार से हम

कभी मंज़िल, कभी रास्ते ने हमें साथ दिया
हर कदम उलझे रहे काफ़िला-ए-सलार से हम

हम से बेबहरा हुई अब जरसे-गुल की सदा
आश्ना थे, कभी हर रंग की झंकार से हम

अब वहाँ कितनी मुरस्सा है वो सूरज की किरन
कल जहाँ क़त्ल हुए थे, उसी तलवार से हम

‘फ़ैज़’ जब चाहा जो कुछ चाहा सदा मांग लिये
हाथ फैला के दिले-बे-ज़रो-दीनार से हम

(तरहदार=बाँका, सरख़ुशी=मस्ती, जरसे-
गुल=फूलों की घंटी, मुरस्सा=शिंगारी हुई)