Faiz Ahmed Faiz – Ik tarana mujahideene filisteen ke liye
एक तराना मुजाहदीने-फ़लिस्तीन के लिये
हम जीतेंगे
हक्का हम इक दिन जीतेंगे
बिल आख़िर इक दिन जीतेंगे
क्या ख़ौफ़ ज़ि-यलग़ारे-आदा
है सीना सिपर हर ग़ाज़ी का
क्या ख़ौफ़ युरूशे-जैशे-कज़ा
सफ़बसता हैं अरवाहुल-शुहदा
डर काहे का
हम जीतेंगे
हक्का हम जीतेंगे
कद-ज़ा अलहक्को-ज़हक अलबातिल
फ़रमूदा रब्बे-अकबर
है जन्नत अपने पांवों तले
और साया-ए-रहमत सर पर है
फिर क्या डर है
हम जीतेंगे
हक्का हम इक दिन जीतेंगे
बिल आख़िर इक दिन जीतेंगे
बेरूत, १५ जून, १९८३
(मुजाहिदीन=सूरमा, ज़ि-यलग़ारे-
आदा=शत्रु के हमलो का, सिपर=
कव्च, अरवाहुल-शुहदा =शहीदों की
रूह, हक्का=रब्ब की कसम, कद-ज़ा
अलहक्को-ज़हक अलबातिल=मेहनत
करने वाला सत्य, नाश करने वाला
झूठ है, फ़रमूदा रब्बे-अकबर=रब्ब
ने कह दिया है)
आदा=शत्रु के हमलो का, सिपर=
कव्च, अरवाहुल-शुहदा =शहीदों की
रूह, हक्का=रब्ब की कसम, कद-ज़ा
अलहक्को-ज़हक अलबातिल=मेहनत
करने वाला सत्य, नाश करने वाला
झूठ है, फ़रमूदा रब्बे-अकबर=रब्ब
ने कह दिया है)