Faiz Ahmed Faiz – Kis harf pe tune
किस हरफ़ पे तूने गोशा-ए-लब ऐ जाने-जहां ग़म्माज किया
किस हरफ़ पे तूने गोशा-ए-लब ऐ जाने-जहां ग़म्माज किया
ऐलाने-जुनूं दिलवालों ने अबके ब-हज़ार अन्दाज़ किया
सौ पैकां थे पैवसते-गुलू जब छेड़ी शौक की लय हमने
सौ तीर तराज़ू थे दिल में जब हमने रकस आग़ाज़ किया
बे हिरसो-हवा बे ख़ौफ़ो-ख़तर, इस हाथ पे सिर उस कफ़ पे जिगर
यूं कू-ए-सनम में वक़्ते- सफ़र नज़्ज़ारा-ए-बामेनाज़ किया
जिस ख़ाक में मिलकर ख़ाक हुए वो सुरमा-ए-चश्मे-ख़लक बनी
जिस ख़ार पे हमने ख़ूं छिड़का, हमरंगे-गुले-तन्नाज़ किया
लो वसल की सायत आ पहुंची, फिर हुकमे-हुज़ूरी पर हमने
आंखों के दरीचे बन्द किये, और सीने का दर वाज़ किया
(गोशा=कोना, ग़म्माज=चुगली, पैकां=तीर की नोक, हिरसो-
हवा=लोभ-लालच, कफ़=हथेली, सुरमा-ए-चश्मे-ख़लक=दुनिया
की आंख का सुरमा, हमरंगे-गुले-तन्नाज़=अपने ही रंग के फूलों
पर व्यंगय किया, वाज़=खोला)
हवा=लोभ-लालच, कफ़=हथेली, सुरमा-ए-चश्मे-ख़लक=दुनिया
की आंख का सुरमा, हमरंगे-गुले-तन्नाज़=अपने ही रंग के फूलों
पर व्यंगय किया, वाज़=खोला)