Faiz Ahmed Faiz – Kiye aarzo se paimaan , jo manzil tak na pohnche
किये आरजू से पैमां, जो मआल तक न पहुंचे
किये आरजू से पैमां, जो मआल तक न पहुंचे
शबो-रोज़े-आशनाई, महो-साल तक न पहुंचे
वो नज़र बहम न पहुंची कि मुहीते-हुस्न करते
तिरी दीद के वसीले ख़द्दो-ख़ाल तक न पहुंचे
वही चश्मा-ए-बका था, जिसे सब सुराब समझे
वही ख़वाब मोतबर थे, जो ख़्याल तक न पहुंचे
तिरा लुत्फ़ वजहे-तसकीं, न करारे-शरहे-ग़म से
कि हैं दिल में वह गिले भी, जो मलाल तक न पहुंचे
कोई यार यां से गुज़रा, कोई होश से न गुज़रा
ये नदीमे-यक-दो-साग़र, मिरे हाल तक न पहुंचे
चलो ‘फ़ैज़’ दिल जलायें, करें फिर से अरज़े-जानां
वो सुख़न जो लब तक आये, पै सवाल तक न पहुंचे
(पैमां=प्रण, मआल=नतीजा, मुहीते-हुस्न=रूप के घेरे
में बांधना, चश्मा-ए-बका =जीवन-धारा, सुराब=मृगतृष्णा,
वजहे-तसकीं=ढाढ़स का कारण, करारे-शरहे-ग़म=दुख की
व्याख्या, नदीमे-यक-दो-साग़र=एक-दो जाम पीने वाले)
में बांधना, चश्मा-ए-बका =जीवन-धारा, सुराब=मृगतृष्णा,
वजहे-तसकीं=ढाढ़स का कारण, करारे-शरहे-ग़म=दुख की
व्याख्या, नदीमे-यक-दो-साग़र=एक-दो जाम पीने वाले)