Faiz Ahmed Faiz – Sharhe bedardi ae halaat na hone paayi
शरहे-बेदर्दी-ए-हालात न होने पाई
शरहे-बेदर्दी-ए-हालात न होने पाई
अबके भी दिल की मुदारात न होने पाई
फिर वही वादा जो इकरार न बनने पाया
फिर वही बात जो इसबात न होने पाई
फिर वो परवाने, जिन्हें इज़ने-शहादत न मिला
फिर वो शमएं, कि जिन्हें रात न होने पाई
फिर वही जां-ब-लबी, लज़्ज़ते-मय से पहले
फिर वो महफ़िल जो ख़राबात न होने पाई
फिर दमे-दीद रहे चश्मो-नज़र दीदतलब
फिर शबे-वसल मुलाकात न होने पाई
फिर वहां बाबे-असर जानिये कब बन्द हुआ
फिर यहां ख़तम मुनाजात न होने पाई
‘फ़ैज़’ सर पर जो हरेक रोज़ क्यामत गुज़री,
एक भी रोज़े-मुकाफ़ात न होने पाई
(शरहे-बेदर्दी-ए-हालात=हालात की बेदर्दी की
व्याख्या, मुदारात=खातिर, इसबात=सबूत,
इज़ने-शहादत =शहीद होने की आज्ञा, जां-ब-
लबी=जान होंठों पर आनी, ख़राबात=शराब-घर,
दमे-दीद=दर्शन का समय, दीदतलब =दर्शन-
अभिलाषी, बाबे-असर=वह दर जहाँ विनती कबूल
हो जाये, मुनाजात=विनती, रोज़े-मुकाफ़ात=फ़ैसले
का दिन)
व्याख्या, मुदारात=खातिर, इसबात=सबूत,
इज़ने-शहादत =शहीद होने की आज्ञा, जां-ब-
लबी=जान होंठों पर आनी, ख़राबात=शराब-घर,
दमे-दीद=दर्शन का समय, दीदतलब =दर्शन-
अभिलाषी, बाबे-असर=वह दर जहाँ विनती कबूल
हो जाये, मुनाजात=विनती, रोज़े-मुकाफ़ात=फ़ैसले
का दिन)