Faiz Ahmed Faiz – Na kisi pe zakham aaya koi
न किसी पे ज़ख़्म अयाँ कोई
न किसी पे ज़ख़म अयां कोई, न किसी को फ़िकर रफ़ू की है
न करम है हम पे हबीब का, न निगाह हम पे अदू की है
सफ़े-ज़ाहदां है तो बेयकीं, सफ़े-मयकशां है तो बेतलब
न वो सुबह विरदो-वज़ू की है, न वो शाम जामो-सुबू की है
न ये ग़म नया न सितम नया कि तिरी जफ़ा का गिला करें
ये नज़र थी पहले भी मुज़तरिब, ये कसक तो दिल में कभू की है
कफ़े-बाग़बां पे बहारे-गुल का है करज़ पहले से बेशतर
कि हरेक फूल के पैरहन में नमूद मेरे लहू की है
नहीं ख़ौफ़े-रोज़े-सियह हमें कि है ‘फ़ैज़’ ज़रफ़े-निगाह में
अभी गोशागीर वो इक किरन जो लगन उस आईनारू की है
(हबीब=प्यारा, अदू=दुश्मन, सफ़े-ज़ाहिदां=धर्म -उपदेशकों
की कतार, विरदो-वज़ू=बार-बार वजू करना, जामो-सुबू=
सुराही-प्याला, मुज़तरिब=बेचैन)
की कतार, विरदो-वज़ू=बार-बार वजू करना, जामो-सुबू=
सुराही-प्याला, मुज़तरिब=बेचैन)