Gulzar – Jab bhi aankh mein ashk bhar aaye
जब भी आँखों में अश्क भर आए
जब भी आँखों में अश्क भर आए
लोग कुछ डूबते नज़र आए
अपना मेहवर बदल चुकी थी ज़मीं
हम ख़ला से जो लौट कर आए
चाँद जितने भी गुम हुए शब के
सब के इल्ज़ाम मेरे सर आए
चंद लम्हे जो लौट कर आए
रात के आख़िरी पहर आए
एक गोली गई थी सू-ए-फ़लक
इक परिंदे के बाल-ओ-पर आए
कुछ चराग़ों की साँस टूट गई
कुछ ब-मुश्किल दम-ए-सहर आए
मुझ को अपना पता-ठिकाना मिले
वो भी इक बार मेरे घर आए