Faiz Ahmed Faiz – Naat
नात
(फ़ारसी रचना)”> ऐ तू कि हसत हर दिले-महज़ूं सराए तू
आवुरदा-अम सराये दिगर अज़ बराए तू।1।
ख़्वाजा ब-तख़्ते-बन्दा-ए-तशवीशे-मुलको-माल
बर ख़ाक रशके-ख़ुसरवे-दौरां गदाए तू।2।
आं जा कसीदा-ख़्वानी-ए-लज़्ज़ाते सीमो-ज़र
ईं जा फ़कत हदीसे-निशाते-लकाए तू।3।
आतश-फ़शां ज़े कहरो-मलामत ज़बाने-शैख़
अज़ असके-तर ज़े दर्दे-ग़रीबां रिदाए तू।4।
बायद कि ज़ालिमाने-जहां-रा सदा कुनद
रोज़े-ब-सूये-अदलो-इनायत सदाए तू।5।
(1. तू वह है, जिसने हर दुखी दिल में अपना
घर बना लिया है। मैं तुम्हारे लिए एक ओर सराय
ले कर आया हूँ।
2. यह हाकिम ताकत और माल की चिंता में
लीन हैं, परन्तु इस धरती के अब के हाकिम तेरे
इस भिखारी के साथ ईर्ष्या करते हैं।
3. वह लोग सोने-चाँदी की शान के प्रशंसक हैं
और यहाँ मेरे पास तुम्हारे मुँह की सुंदरता से मिलने
वाले आनंद के सिवा कुछ नहीं है।
4. शेख की जुबान से गुस्से और निंदा के अंगारे भड़क
रहे हैं, जब कि तेरी चादर को ग़रीबों की आंखों में से
बहने वाली दर्द भरी तरल धारा भिगो रही है।
5. दुनिया के ज़ालिमों को सुना देना चाहिए कि एक दिन
उन को न्याय और सदभावना की तरफ़ आना ही पड़ेगा।)
घर बना लिया है। मैं तुम्हारे लिए एक ओर सराय
ले कर आया हूँ।
2. यह हाकिम ताकत और माल की चिंता में
लीन हैं, परन्तु इस धरती के अब के हाकिम तेरे
इस भिखारी के साथ ईर्ष्या करते हैं।
3. वह लोग सोने-चाँदी की शान के प्रशंसक हैं
और यहाँ मेरे पास तुम्हारे मुँह की सुंदरता से मिलने
वाले आनंद के सिवा कुछ नहीं है।
4. शेख की जुबान से गुस्से और निंदा के अंगारे भड़क
रहे हैं, जब कि तेरी चादर को ग़रीबों की आंखों में से
बहने वाली दर्द भरी तरल धारा भिगो रही है।
5. दुनिया के ज़ालिमों को सुना देना चाहिए कि एक दिन
उन को न्याय और सदभावना की तरफ़ आना ही पड़ेगा।)