Hindi Poetry

Suryakant Tripathi Nirala – Pralaap


प्रलाप

वीणानिन्दित वाणी बोल!
संशय-अन्धकामय पथ पर भूला प्रियतम तेरा–
सुधाकर-विमल धवल मुख खोल!
प्रिये, आकाश प्रकाशित करके,
शुष्ककण्ठ कण्टकमय पथ पर
छिड़क ज्योत्स्ना घट अपना भर भरके!

शुष्क हूँ–नीरस हूँ–उच्छ्श्रृखल–
और क्या क्या हूँ, क्या मैं दूँ अब इसका पता,
बता तो सही किन्तु वह कौन घेरनेवाली
बाहु-बल्लियों से मुझको है एक कल्पना-लता!

अगर वह तू है तो आ चली
विहगगण के इस कल कूजन में–
लता-कुंज में मधुप-पुंज के ’गुनगुनगुन’ गुंजन में;
क्या सुख है यह कौन कहे सखि,
निर्जन में इस नीरव मुख-चुम्बन में!

अगर बतायेगी तू पागल मुझको
तो उन्मादिनी कहूँगा मैं भी तुझको
अगर कहेगी तू मुझको ’यह है मतवाला निरा’
तो तुझे बताऊँगा मैं भी लावण्य-माधुरी-मदिरा।

अगर कभी देगी तू मुझको कविता का उपहार
तो मैं भी तुझे सुनाऊँगा भैरव दे पद दो चार!
शान्ति-सरल मन की तू कोमल कान्ति–
यहाँ अब आ जा,
प्याला-रस कोई हो भर कर
अपने ही हाथों से तू मुझे पिला जा,
नस-नस में आनन्द-सिन्धु के धारा प्रिये, बहा जा;
ढीले हो जायें ये सारे बन्धन,
होये सहज चेतना लुप्त,–
भूल जाऊँ अपने को, कर के मुझे अचेतन।
भूलूँ मैं कविता के छन्द,
अगर कहीं से आये सुर-संगीत–
अगर बजाये तू ही बैठ बगल में कोई तार
तो कानों तक आते ही रुक जाये उनकी झंकार;

भूलूँ मैं अपने मन को भी
तुझको-अपने प्रियजन को भी!
हँसती हुई, दशा पर मेरी प्रिय अपना मुख मोड़,
जायेगी ज्यों-का-त्यों मुझको यहाँ अकेला छोड़!
इतना तो कह दे–सुख या दुख भर लेगी
जब इस नद से कभी नई नय्या अपनी खेयेगी?