Faiz Ahmed Faiz – Aawaazein
आवाज़ें
ज़ालिम
जशन है मातमे-उम्मीद का आओ लोगो
मरगे-अम्बोह का तयोहार मनायो लोगो
अदम-आबाद को आबाद किया है मैंने
तुम को दिन-रात से आज़ाद किया है मैंने
जलवा-ए-सुबह से क्या मांगते हो
बिसतरे-ख़्वाब से क्या चाहते हो
सारी आंखों को तहे-तेग़ किया है मैंने
सारे ख़्वाबों का गला घोंट दिया है मैंने
अब न लहकेगी किसी शाख़ पे फूलों की हिना
फ़सले-गुल आयेगी नमरूद के अंगार लिये
अब न बरसात में बरसेगी गुहर की बरखा
अबर आयेगा ख़सो-ख़ार के अम्बार लिये
मेरा मसलक भी नया राहे-तरीकत भी नई
मेरे कानूं भी नये मेरी शरियत भी नई
अब फ़कीहाने-हरम दस्ते-सनम चूमेंगे
सरवकद मिट्टी के बौनों के कदम चूमेंगे
फ़र्श पर आज दरे-सिदक-ओ-सफ़ा बन्द हुआ
अर्श पर आज हर इक बाबे-दुआ बन्द हुआ
मज़लूम
रात छाई तो हर इक दर्द के धारे फूटे
सुबह फूटी तो हर इक ज़ख़्म के टांके टूटे
दोपहर आई तो हर रग ने लहू बरसाया
दिन ढला, ख़ौफ़ का इफ़रीत मुकाबिल आया
या ख़ुदा ये मेरी गर्दाने-शबो-रोज़ो-सहर
ये मेरी उमर का बेमंज़िल-ओ-आराम सफ़र
क्या यही कुछ मेरी किस्मत में लिखा है तूने
हर मसररत से मुझे आक लिया है तूने
वो ये कहते हैं तू ख़ुशनूद हर इक ज़ुल्म से है
वो ये कहते हैं हर इक ज़ुल्म तेरे हुक़्म से है
गर ये सच है तेरे अदल से इनकार करूं
उनकी मानूं कि तिरी ज़ात का इकरार करूं
निदा-ए-ग़ैब
हर इक उलिल-अमर को सदा दो
कि अपनी फ़रदे-अमल संभाले
उठेगा जब जंमे-सरफ़रोशां
पड़ेंगे दारो-रसन के लाले
कोई न होगा कि जो बचा ले
जज़ा सज़ा सब यहीं पे होगी
यहीं अज़ाबो-सवाब होगा
यहीं से उट्ठेगा शोरे-महशर
यहीं पे रोज़े-हिसाब होगा
समरकन्द, मई, १९७९
अदम-आबाद=परलोक, हिना=मेहंदी,
नमरूद=एक जालिम बादशाह, गुहर=
मोती, ख़सो-ख़ार=घास-फूस और काँटे,
मसलक=विधि, तरीकत=भक्ति, फ़कीहाने-
हरम=मौलवी, सनम=मूर्ति, दरे-सिदक-ओ-
सफ़ा=सच्च और पवित्रता का दरवाज़ा,
इफ़रीत=भूत, गर्दाने-शबो-रोज़ो-सहर=रात-
दिन का चक्कर, आक=खाली, ख़ुशनूद=संतुष्ट,
निदा-ए-ग़ैब=आकाशवाणी, उलिल-अमर=
हाकिम, जंमे-सरफ़रोशां=सिर देने वालों की भीड़,
दारो-रसन=फांसी का तख़्ता और फंदा, जज़ा=
इनाम, अज़ाबो-सवाब=दुख और पुण्य का इनाम,
महशर =क़यामत)