Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Sochne do


सोचने दो

(आंदरे वोजनेसेंसकी के नाम)

इक ज़रा सोचने दो
इस ख़्याबां में
जो इस लहज़ा बियाबां भी नहीं
कौन-सी शाख़ में फूल आये थे सबसे पहले
कौन बे-रंग हुई रंजो-तअब से पहले
और अब से पहले
किस घड़ी कौन-से मौसम में यहां
ख़ून का कहत पड़ा
गुल की शहरग पे कड़ा
वक़्त पड़ा
सोचने दो

इक ज़रा सोचने दो
येह भरा शहर जो अब वादी-ए-वीरां भी नहीं
इसमें किस वक़्त कहां
आग लगी थी पहले
इसके सफ़बसता दरीचों में से किस में अव्वल
ज़ह हुई सुरख़ शुआयों की कमां
किस जगह जोत जगी थी पहले
सोचने दो

हम से उस देस का तुम नामो-निशां पूछते हो
जिसकी तारीख़ न जुग़राफ़ीया अब याद आये

और याद आए तो महबूबे-गुज़सता की तरह
रू-ब-रू आने से जी घबराये

हां, मगर जैसे कोई
ऐसे महबूब या महबूबा का दिल रखने को
आ निकलता है
कभी रात बिताने के लिए
हम अब उस उमर को आ पहुंचे हैं
जब हम भी यूं ही
दिल से मिल आते हैं बस रसम निभाने के लिए
दिल की क्या पूछते हो
सोचने दो

मासको, मारच, १९६७

(ख़्याबां=हरियाली, रंजो-तअब=दुख और थकान,
कहत=अकाल, सफ़बसता दरीचे=सीधी कतार में
झरोखे)