Gulzar – Budha Dariya


बुड्ढा दरिया-१

मुँह ही मुँह कुछ बुड़बुड़ करता, बहता है
ये बुड्ढा दरिया!

कोई पूछे तुझको क्या लेना, क्या लोग किनारों
पर करते हैं,
तू मत सुन, मत कान लगा उनकी बातों पर!
घाट पे लच्छी को गर झूठ कहा है साले माधव ने,
तुझको क्या लेना लच्छी से? जाये,जा के डूब मरे!

यही तो दुःख है दरिया को!
जन्मी थी तो “आँवल नाल” उसी के हाथ में सौंपी
थी झूलन दाई ने,
उसने ही सागर पहुचाये थे वह “लीडे”,
कल जब पेट नजर आयेगा, डूब मरेगी
और वह लाश भी उसको ही गुम करनी होगी!
लाश मिली तो गाँव वाले लच्छी को बदनाम करेंगे!!

मुँह ही मुँह, कुछ बुड़बुड़ करता, बहता है
ये बुड्ढा दरिया!!

बुड्ढा दरिया-२

मुँह ही मुँह, कुछ बुड़बुड़ करता, बहता है
ये बुड्ढा दरिया

दिन दोपहरे, मैंने इसको खर्राटे लेते देखा है
ऐसा चित बहता है दोनों पाँव पसारे
पत्थर फेंकें , टांग से खेंचें, बगले आकर चोंच मारें
टस से मस होता ही नहीं है
चौंक उठता है जब बारिश की बूँदें
आ कर चुभती हैं
धीरे धीरे हांफने लाग जाता है उसके पेट का पानी।
तिल मिल करता, रेत पे दोनों बाहें मारने लगता है
बारिश पतली पतली बूंदों से जब उसके पेट में
गुदगुद करती है!

मुँह ही मुँह कुछ बुड़बुड़ करता रहता है
ये बुड्ढा दरिया!!

बुड्ढा दरिया-३

मुँह ही मुँह कुछ बुड़बुड़ करता, बहता है
ये बुड्ढा दरिया!

पेट का पानी धीरे धीरे सूख रहा है,
दुबला दुबला रहता है अब!
कूद के गिरता था ये जिस पत्थर से पहले,
वह पत्थर अब धीरे से लटका के इस को
अगले पत्थर से कहता है,–
इस बुड़ढे को हाथ पकड़ के, पार करा दे!!

मुँह ही मुँह कुछ बुड़बुड़ करता, बहता रहता
है ये दरिया!
छोटी छोटी ख्वाहिशें हैं कुछ उसके दिल में–
रेत पे रेंगते रेंगते सारी उम्र कटी है,
पुल पर चढ के बहने की ख्वाहिश है दिल में!

जाडो में जब कोहरा उसके पूरे मुँह पर आ जाता है,
और हवा लहरा के उसका चेहरा पोंछ के जाती है–
ख्वाहिश है कि एक दफा तो
वह भी उसके साथ उड़े और
जंगल से गायब हो जाये!!
कभी कभी यूँ भी होता है,
पुल से रेल गुजरती है तो बहता दरिया,
पल के पल बस रुक जाता है–


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