Gulzar – Chori chori ki woh jhaankian
चोरी चोरी की वो झांकियां,
झूठी छींके, झूठी खांसियां
देख के सबको तुझपे नज़र जाती थी
शाम तेरी गली में गुजर जाती थी
देखना भी नहीं और वहीं देखना
कोई कंकर उठाकर कहीं फेंकना
तेरी खिड़की का पर्दा खिसकता हुआ
कांच पर एक साया सरकता हुआ
साँस रुक जाती थी, आँख भर जाती थी
शाम तेरी गली में गुजर जाती थी
पान वाले से बेवज़ह की यारियां
और यारों से छुपने की दुश्वारियां
डाकिये से कभी कोई ख़त पूछना
लिखके काग़ज़ पे कुछ भी गलत पूछना
आँख से कह दिया कुछ तो डर जाती थी
शाम तेरी गली में गुजर जाती थी