Hindi Poetry

Gulzar – Garm laashein giri faslon mein


गर्म लाशें गिरीं फ़सीलों से

गर्म लाशें गिरीं फ़सीलों से
आसमाँ भर गया है चीलों से

सूली चढ़ने लगी है ख़ामोशी
लोग आए हैं सुन के मीलों से

कान में ऐसे उतरी सरगोशी
बर्फ़ फिसली हो जैसे टीलों से

गूँज कर ऐसे लौटती है सदा
कोई पूछे हज़ारों मीलों से

प्यास भरती रही मिरे अंदर
आँख हटती नहीं थी झीलों से

लोग कंधे बदल बदल के चले
घाट पहुँचे बड़े वसीलों से