Javed Akhtar – Dashte junoon veeraniyan
1
दश्ते-जुनूँ वीरानियाँ, क़ह्ते-सुकूँ हैरानियाँ, इक दिल और उसकी
बे-सरो-सामानियाँ, अज़ ख़ाकदाँ ता आस्माँ, तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ
चेहरा ज़मीं का ज़र्द है, लहजा हवा का सर्द है, पहने फ़िज़ाएँ हैं कफ़न
या गर्द है, मातम-कुनाँ है ये समाँ, तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ
2
सब हमसफ़र अब खो चुके, हम हाथ सबसे धो चुके, हम सबको कब का रो चुके,
उम्मीद हसरत आरज़ू जितने फ़रोज़ाँ थे यहाँ गुल सब चिराग़ अब हो चुके
अब एक लम्बी रात है, अब एक ही तो बात है, अब दिल पे जैसे ग़म का
भारी हाथ है, अब इक यही है दास्ताँ, तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ
3
अब ये सफ़र दुश्वार है, हर हर क़दम दीवार है, हर लम्हा इक आज़ार है
अब रोज़ो-शब, शामो-सहर है वक़्त वो बीमार जो मरने से भी लाचार है
मजबूर होके ज़िंदगी, है साँस रोके ज़िंदगी, है गुंग अब आवाज़
खोके ज़िंदगी, हैं इस ख़मोशी में निहाँ तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ
4
सहमी हुई हैं ख्वाहिशें, ठिठकी हुई है काविशें, क्या दोस्ती क्या रंजिशें,
सब जैसे अब हैं बेअसर बेवाक़आ-सी ज़िंदगी की हैं अजब ये साज़शें
जो ग़म थे वो भी खो गए, दिल जैसे ख़ाली हो गए, कल जो थे अपने हमसफ़र
वो तो गए, अब हर तरफ़ हैं हुक्मराँ तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ
5
ऐ ज़ीस्त ये तू ही बता, ये क्या हुआ कैसे हुआ, क्यों हमने पाई ये सज़ा
अब याद करते हैं अगर तो याद तक आता नहीं देखा था हमने ख्वाब क्या
क्या साज़ क्या जामो-सुबू, रूख़सत हुई हर आरज़ू, चारों पहर लगता है
जैसे चारसू, हैं साकितो-जामिद यहाँ तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ-तन्हाइयाँ