Mirza Ghalib – Dil se teri nigah jigar tak utar gyi

दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई
दोनों को इक अदा में रज़ामन्द कर गई

चाक हो गया है सीना ख़ुशा लज़्ज़त-ए-फ़राग़
तकलीफ़-ए-परदादारी-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर गई

वो बादा-ए-शबाना की सरमसितयां कहां
उठिये बस अब कि लज़्ज़त-ए-ख़्वाब-ए-सहर गई

उड़ती फिरे है ख़ाक मेरी कू-ए-यार में
बारे अब ऐ हवा, हवस-ए-बाल-ओ-पर गई

देखो तो दिल फ़रेबी-ए-अन्दाज़-ए-नक्श-ए-पा
मौज-ए-ख़िराम-ए-यार भी क्या गुल कतर गई

हर बुलहवस ने हुसन परसती श्यार की
अब आबरू-ए-शेवा-ए-अहल-ए-नज़र गई

नज़्ज़ारे ने भी काम किया वां नकाब का
मसती से हर निगह तेरे रुख़ पर बिखर गई

फ़रदा-ओ-दी का तफ़रका यक बार मिट गया
कल तुम गए कि हम पे क्यामत गुज़र गई

मारा ज़माने ने ‘असदुल्लाह ख़ां’ तुम्हें
वो वलवले कहां, वो जवानी किधर गई

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