Mirza Ghalib – Koi din gar zindgaani aur hai
कोई दिन गर ज़िन्दगानी और है
अपने जी में हमने ठानी और है
आतिश-ए-दोज़ख़ में ये गरमी कहां
सोज़-ए-ग़म-हाए-नेहानी और है
बारहा देखीं हैं उनकी रंजिशें
पर कुछ अब के सरगिरानी और है
देके ख़त मुंह देखता है नामाबर
कुछ तो पैग़ाम-ए-ज़बानी और है
काता-अम्मार हैं अकसर नुजूम
वो बला-ए-आसमानी और है
हो चुकीं ‘ग़ालिब’ बलाएं सब तमाम
एक मरग-ए-ना-गहानी और है