Mirza Ghalib – Mehram nahi hai tu
महरम नहीं है तू ही नवा-हाए-राज़ का
यां वरना जो हिजाब है, परदा है साज़ का
रंगे-शिकसता सुबहे-बहारे-नज़ारा है
ये वकत है शुगुफ़तने-गुल-हाए-नाज़ का
तू, और सू-ए-ग़ैर नज़र-हाए तेज़-तेज़
मैं, और दुख तेरी मिज़गां-हाए-दराज़ का
सरफ़ा है ज़बते-आह में मेरा, वगरना मैं
तोअमा हूं एक ही नफ़से-जां-गुदाज़ का
हैं बस कि जोशे-बादा से शीशे उछल रहे
हर गोशा-ए-बिसात है सर शीशा-बाज़ का
काविश का दिल करे है तकाज़ा कि है हनूज़
नाख़ुन पे करज़ इस गिरहे-नीम-बाज़ का
ताराज-ए-काविशे-ग़मे-हजरां हुआ ”असद”
सीना, कि था दफ़ीना-ए-गुहर-हाए-राज़ का