Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Na gul ae nagma hoon


न गुल-ए-नग़मा हूं, न परदा-ए-साज़
मैं हूं अपनी शिकसत की आवाज़

तू, और आरायश-ए-ख़म-ए-काकुल
मैं, और अन्देशा-हाए-दूरो-दराज़

लाफ़-ए-तमकीं फ़रेब-ए-सादा-दिली
हम हैं, और राज़ हाए-सीना-ए-गुदाज़

हूं गिरफ़तारे उलफ़त-ए-सैयाद
वरना बाकी है ताकते परवाज़

वो भी दिन हो कि उस सितमगर से
नाज़ खींचूं बजाय हसरते-नाज़

नहीं दिल में तेरे वो कतरा-ए-ख़ूं
जिस से मिज़गां हुयी न हो गुलबाज़

मुझको पूछा तो कुछ ग़ज़ब न हुआ
मैं ग़रीब और तू ग़रीब-नवाज़

असदुललाह ख़ां तमाम हुआ
ऐ दरेग़ा वह रिन्द-ए-शाहदबाज़