Mirza Ghalib – Nuktachi hai gham ae dil usko sunaye na bne
नुकताचीं है, ग़मे-दिल उसको सुनाये न बने
क्या बने बात, जहां बात बनाये न बने
मैं बुलाता तो हूं उसको, मगर ऐ जज़बा-ए-दिल
उस पे बन जाए कुछ ऐसी, कि बिन आये न बने
खेल समझा है, कहीं छोड़ न दे भूल न जाये
काश ! यों भी हो कि बिन मेरे सताये न बने
ग़ैर फिरता है, लिये यों तेरे ख़त को कि अगर
कोई पूछे कि ये क्या है, तो छुपाये न बने
इस नज़ाकत का बुरा हो, वो भले हैं तो क्या
हाथ आयें, तो उनहें हाथ लगाये न बने
कह सके कौन कि ये जलवागरी किसकी है
परदा छोड़ा है वो उसने कि उठाये न बने
मौत की राह न देखूं, कि बिन आये न रहे
तुम को चाहूं कि न आयो, तो बुलाये न बने
बोझ वो सर से गिरा है कि उठाये न उठे
काम वो आन पड़ा है कि बनाये न बने
इशक पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतश ‘ग़ालिब’
कि लगाये न लगे और बुझाये न बने