Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Satayash agar hai iss kadar


सतायश गर है ज़ाहद इस कदर जिस बाग़े-रिज़वां का
वह इक गुलदसता है हम बेख़ुदों के ताके-निसियां का

बयां क्या कीजिये बेदादे-काविश-हाए-मिज़गां का
कि हर इक कतरा-ए-ख़ूं दाना है तसबीहे-मरजां का

न आई सतवते-कातिल भी मानय मेरे नालों को
लिया दांतों में जो तिनका, हुआ रेशा नैसतां का

दिखाऊंगा तमाशा, दी अगर फ़ुरसत ज़माने ने
मेरा हर दाग़-ए-दिल इक तुखम है सरव-ए-चिराग़ां का

किया आईनाख़ाने का वो नक्शा तेरे जलवे ने
करे जो परतव-ए-ख़ुरशीद-आलम शबनमिसतां का

मेरी तामीर में मुज़मिर है इक सूरत ख़राबी की
हयूला बरक-ए-ख़िरमन का है ख़ून-ए-गरम दहकां का

उगा है घर में हर-सू सबज़ा, वीरानी, तमाशा कर
मदार अब खोदने पर घास के, है मेरे दरबां का

ख़मोशी में नेहां ख़ूंगशता लाखों आरज़ूएं हैं
चिराग़-ए-मुरदा हूं में बेज़ुबां गोर-ए-ग़रीबां का

हनूज़ इक परतव-ए-नक्श-ए-ख़याल-ए-यार बाकी है

दिल-ए-अफ़सुरदा गोया हुजरा है यूसुफ़ के ज़िन्दां का

बग़ल में ग़ैर की आप आज सोते हैं कहीं, वरना

सबब क्या? ख़्वाब में आकर तबस्सुम-हाए-पिनहां का

नहीं मालूम किस-किसका लहू पानी हुआ होगा

कयामत है सरशक-आलूदा होना तेरी मिज़गां का

नज़र में है हमारी जादा-ए-राह-ए-फ़ना ‘ग़ालिब’

कि ये शीराज़ा है आलम के अज्जाए-परीशां का