Ramdhari Singh Dinkar – Ek bhartiye aatm ake prati
एक भारतीय आत्मा के प्रति
(कवि की साठवीं वर्ष गांठ पर)
रेशम के डोरे नहीं, तूल के तार नहीं,
तुमने तो सब कुछ बुना साँस के धागों से;
बेंतों की रेखाएं रगों में बोल उठीं,
गुलबदन किरन फूटी कड़ियों की रागों से ।
चीखें जब बनतीं टेक, अंतराएँ आहें,
मन की कचोट जब पिघल गीत में घुलती है;
दुनिया सुनती चुपचाप आप अपने भीतर,
आँखें भीगें, लेकिन, जबान कब खुलती है ?
ये खूब कुहासे लाल-लाल झीने-झीने,
यह खूब घटा रंगीन सँवरकर छाई है।
दुलहन कोई है छिपी? या कि मंजूषा में
धरती की पहली उषा सिमट कर आई है ?
तुम साठ साल के हुए, साठ ही और लगें;
पर, यह दुलहन क्या कभी मलिन हो पाएगी ?
हर भोर कली पर नई-नई शबनम होगी,
हर रोज वेदना रंगों-बीच नहाएगी ।
है कौन सत्य? पत्ते जिसके झरते रहते ?
या वह जिसमें नित नूतन पत्र निकलते हैं ?
दो रूप, एक से नाश हमें अनुगत करता,
दूसरा, मृत्यु पर हमीं पाँव दे चलते हैं ।
(1950 ई०)