Ramdhari Singh Dinkar – Sanjeevan dhan do
संजीवन-घन दो जो त्रिकाल-कूजित संगम है, वह जीवन-क्षण दो, मन-मन मिलते जहाँ देवता! वह विशाल मन दो। माँग रहा जनगण
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संजीवन-घन दो जो त्रिकाल-कूजित संगम है, वह जीवन-क्षण दो, मन-मन मिलते जहाँ देवता! वह विशाल मन दो। माँग रहा जनगण
Read Moreद्वन्द्व गीत रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वन्द्व गीत (१) चाहे जो भी फसल उगा ले, तू जलधार बहाता चल। जिसका भी
Read Moreविपक्षिणी (एक रमणी के प्रति जो बहस करना छोड़कर चुप हो रही) क्षमा करो मोहिनी विपक्षिणी! अब यह शत्रु तुम्हारा
Read Moreनई आवाज कभी की जा चुकीं नीचे यहाँ की वेदनाएँ, नए स्वर के लिए तू क्या गगन को छानता है?
Read Moreजयप्रकाश झंझा सोई, तूफान रुका, प्लावन जा रहा कगारों में; जीवित है सबका तेज किन्तु, अब भी तेरे हुंकारों में।
Read Moreस्वर्ग के दीपक [उनके लिए जो हमारी कतार में आने से इनकार करते हैं] कहता हूँ, मौसिम फिरा, सितारो !
Read Moreगोपाल का चुम्बन छिः, छिः, लज्जा-शरम नाम को भी न गई रह हाय, औचक चूम लिया मुख जब मैं दूह
Read Moreफूल अवनी के नक्षत्र! प्रकृति के उज्ज्वल मुक्ताहार! उपवन-दीप! दिवा के जुगनू! वन के दृग सुकुमार! मेरी मृदु कल्पना-लहर-से पुलकाकुल,
Read Moreकवि नवल उर में भर विपुल उमंग, विहँस कल्पना-कुमारी-संग, मधुरिमा से कर निज शृंगार, स्वर्ग के आँगन में सुकुमार !
Read Moreपरदेशी माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी? भय है, सुन कर हँस दोगे मेरी नादानी परदेशी! सृजन-बीच
Read Moreफूँक दे जो प्राण में उत्तेजना फूँक दे जो प्राण में उत्तेजना, गुण न वह इस बाँसुरी की तान में।
Read Moreकलातीर्थ (१) पूर्णचन्द्र-चुम्बित निर्जन वन, विस्तृत शैल प्रान्त उर्वर थे; मसृण, हरित, दूर्वा-सज्जित पथ, वन्य कुसुम-द्रुम इधर-उधर थे। पहन शुक्र
Read Moreगीतवासिनी सात रंगों के दिवस, सातो सुरों की रात, साँझ रच दूँगा गुलावों से, जवा से प्रात। पाँव धरने के
Read Moreराहु चेतनाहीन ये फूल तड़पना क्या जानें ? जब भी आ जाती हवा की पग बढाते हैं । झूलते रात
Read Moreवलि की खेती जो अनिल-स्कन्ध पर चढ़े हुए प्रच्छन्न अनल ! हुतप्राण वीर की ओ ज्वलन्त छाया अशेष ! यह
Read Moreतुम क्यों लिखते हो तुम क्यों लिखते हो? क्या अपने अंतरतम को औरों के अंतरतम के साथ मिलाने को? अथवा
Read Moreभगवान की बिक्री लोगे कोई भगवान? टके में दो दूँगा। लोगे कोई भगवान? बड़ा अलबेला है। साधना-फकीरी नहीं, खूब खाओ,
Read Moreबरसों बाद मिले तुम हमको बरसों बाद मिले तुम हमको आओ जरा बिचारें, आज क्या है कि देख कौम को
Read Moreहो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियो कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियो। श्रवण खोलो¸ रूक सुनो¸ विकल यह नाद कहां से आता है।
Read Moreचांद का कुर्ता हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला, ‘‘सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा
Read Moreरोटी और स्वाधीनता (अय ताइरे-लाहूती ! उस रिज़्क से मौत अच्छी, जिस रिज़्क से आती हो परवाज़ में कोताही।-इक़बाल) (1)
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