Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Yak zarr ae zameen nahi bekaar baag ka


यक ज़र्रा-ए-ज़मीं नहीं बेकार बाग़ का
यां जादा भी फ़तीला है लाले के दाग़ का

बे-मै किसे है ताकत-ए-आशोब-ए-आगही
खेंचा है अजज़-ए-हौसला ने ख़त अयाग़ का

बुलबुल के कार-ओ-बार पे हैं ख़न्दा-हाए-गुल
कहते हैं जिस को इशक ख़लल है दिमाग़ का

ताज़ा नहीं है नशा-ए-फ़िकर-ए-सुख़न मुझे
तिरयाकी-ए-कदीम हूं दूद-ए-चिराग़ का

सौ बार बन्द-ए-इशक से आज़ाद हम हुए
पर क्या करें कि दिल ही अदू है फ़राग़ का

बे-ख़ून-ए-दिल है चशम में मौज-ए-निगह ग़ुबार
यह मै-कदा ख़राब है मै के सुराग़ का
बाग़-ए-शगुफ़ता तेरा बिसात-ए-नशात-ए-दिल
अब्र-ए-बहार ख़ुम-कदा किस के दिमाग़ का