Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Maze jahaan ke apni nazar mein khaak nahi


मज़े जहान के अपनी नज़र में ख़ाक नहीं
सिवाए ख़ून-ए-जिगर, सो जिगर में ख़ाक नहीं

मगर ग़ुबार हुए पर हवा उड़ा ले जाये
वगरना ताब-ओ-तबां बालो-पर में ख़ाक नहीं

ये किस बहशत-शमायल की आमद-आमद है ?
कि ग़ैर-ए-जलवा-ए-गुल रहगुज़र में ख़ाक नहीं

भला उसे न सही, कुछ मुझी को रहम आता
असर मेरे नफ़स-ए-बेअसर में ख़ाक नहीं

ख़याल-ए-जलवा-ए-गुल से ख़राब है मयकश
शराबख़ाने के दीवार-ओ-दर में ख़ाक नहीं

हुआ हूं इशक की ग़ारतगरी से शरिमन्दा
सिवाय हसरत-ए-तामीर घर में ख़ाक नहीं

हमारे शे’र हैं अब सिरफ़ दिल-लगी के ”असद”
खुला कि फ़ायदा अरज़-ए-हुनर में ख़ाक नहीं