Mirza Ghalib – Kataat
कतआत
1
एक अहले-दर्द ने सुनसान जो देखा कफ़स
यों कहा आती नहीं अब कयों सदाए-अन्दलीब
बाल-ओ-पर दो-चार दिखला कर कहा सय्याद ने
ये निशानी रह गयी है अब बजाए- अन्दलीब
2
शब को ज़ौके-गुफ़तगू से तेरा दिल बेताब था
शोख़ी-ए-वहशत से अफ़साना फ़ुसूने-ख़्वाब था
वां हजूमे-नग़महाए-साज़े-इशरत था ”असद”
नाख़ुने-ग़म यां सरे-तारे-नफ़स मिज़राब था
3
दूद को आज उसके मातम में सियहपोशी हुई
वो दिले-सोज़ां कि कल तक शमए-मातमख़ाना था
शिकवा-ए-यारां ग़ुबारे-दिल में पिनहां कर दिया
”ग़ालिब” ऐसे गंज को शायां यही वीराना था