Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Dekhna kismet


देखना किस्मत कि आप अपने पे रशक आ जाये है
मैं उसे देखूं, भला कब मुझसे देखा जाये है

हाथ धो दिल से यही गरमी गर अन्देशे में है
आबगीना तुन्दी-ए-सहबा से पिघला जाये है

ग़ैर को या रब ! वो कयों कर मना-ए-गुसताख़ी करे
गर हया भी उसको आती है, तो शरमा जाये है

शौक को ये लत, कि हरदम नाला ख़ींचे जायए
दिल कि वो हालत, कि दम लेने से घबरा जाये है

दूर चशम-ए-बद ! तेरी बज़म-ए-तरब से वाह, वाह
नग़मा हो जाता है वां गर नाला मेरा जाये है

गरचे है तरज़-ए-तग़ाफ़ुल, परदादार-ए-राज़-ए-इशक
पर हम ऐसे खोये जाते हैं कि वो पा जाये है

उसकी बज़म-आराययां सुनकर दिल-ए-रंजूर यां
मिसल-ए-नक्श-ए-मुद्दआ-ए-ग़ैर बैठा जाये है

होके आशिक, वो परीरुख़ और नाज़ुक बन गया
रंग खुलता जाये है, जितना कि उड़ता जाये है

नक्श को उसके मुसव्विर पर भी क्या-क्या नाज़ है
खींचता है जिस कदर, उतना ही खिंचता जाये है

साया मेरा मुझसे मिसल-ए-दूद भागे है ”असद”
पास मुझ आतिश-ब-ज़ां के किस से ठहरा जाये है