Ramdhari Singh Dinkar – Prateeksha
प्रतीक्षा अयि संगिनी सुनसान की! मन में मिलन की आस है, दृग में दरस की प्यास है, पर, ढूँढ़ता फिरता
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प्रतीक्षा अयि संगिनी सुनसान की! मन में मिलन की आस है, दृग में दरस की प्यास है, पर, ढूँढ़ता फिरता
Read Moreश्याम-श्यामा के युगल पद श्याम-श्यामा के युगल पद, कोकनद मन के विनिर्मद। हृदय के चन्दन सुखाशय, नयन के वन्दन निरामय,
Read Moreकाम के छवि-धाम काम के छवि-धाम, शमन प्रशमन राम! सिन्धुरा के सीस सिन्दूर, जगदीश, मानव सहित-कीश, सीता-सती-नाम। अरि-दल-दलन-कारि, शंकर, समनुसारि
Read Moreनिमंत्रण तिमिर में स्वर के बाले दीप, आज फिर आता है कोई। ’हवा में कब तक ठहरी हुई रहेगी जलती
Read Moreशेष गान संगिनि, जी भर गा न सका मैं। गायन एक व्याज़ इस मन का, मूल ध्येय दर्शन जीवन का,
Read Moreहे जननि, तुम तपश्चरिता हे जननि, तुम तपश्चरिता, जगत की गति, सुमति भरिता। कामना के हाथ थक कर रह गये
Read Moreमुक्तादल जल बरसो, बादल मुक्तादल जल बरसो, बादल, सरिसर कलकलसरसो बादल! शिखि के विशिख चपल नर्तन वन, भरे कुंजद्रुम षटपद
Read Moreधीरे-धीरे गा बटोही, धीरे-धीरे गा। बोल रही जो आग उबल तेरे दर्दीले सुर में, कुछ वैसी ही शिखा एक सोई
Read Moreपरदेशी माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेशी? भय है, सुन कर हँस दोगे मेरी नादानी परदेशी! सृजन-बीच
Read Moreगगन गगन है गान तुम्हारा गगन गगन है गान तुम्हारा, घन घन जीवनयान तुम्हारा। नयन नयन खोले हैं यौवन, यौवन
Read Moreबीन वारण के वरण घन बीन वारण के वरण घन, जो बजी वर्षित तुम्हारी, तार तनु की नाचती उतरी, परी,
Read Moreआशा का दीपक वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है; थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर
Read Moreशब्द-वेध खेल रहे हिलमिल घाटी में, कौन शिखर का ध्यान करे ? ऐसा बीर कहाँ कि शैलरुह फूलों का मधुपान
Read Moreतपन से घन, मन शयन से तपन से घन, मन शयन से, प्रातजीवन निशि-नयन से। प्रमद आलस से मिला है,
Read Moreमाँ अपने आलोक निखारो माँ अपने आलोक निखारो, नर को नरक-त्रास से वारो। विपुल दिशावधि शून्य वगर्जन, व्याधि-शयन जर्जर मानव
Read Moreप्रणति-3 आनेवालो ! तुम्हें प्रणाम । ‘जय हो’, नव होतागण ! आओ, संग नई आहुतियाँ लाओ, जो कुछ बने फेंकते
Read Moreपरिचय सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत
Read Moreतुम्हारी छांह है, छल है तुम्हारी छांह है, छल है, तुम्हारे बाल हैं, बल है। दृगों में ज्योति है, शय
Read Moreकिरणों की परियां मुसका दीं किरणों की परियाँ मुसका दीं। ज्योति हरी छाया पर छा दी। परिचय के उर गूंजे
Read Moreप्रणति-2 नमन उन्हें मेरा शत बार । सूख रही है बोटी-बोटी, मिलती नहीं घास की रोटी, गढ़ते हैं इतिहास देश
Read Moreघन आये घनश्याम न आये घन आये घनश्याम न आये। जल बरसे आँसू दृग छाये। पड़े हिंडोले, धड़का आया, बढ़ी
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