Javed Akhtar – Zara mausam toh badla hai magar
ज़रा मौसम तो बदला है मगर पेड़ों की शाख़ों पर नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे बहुत
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ज़रा मौसम तो बदला है मगर पेड़ों की शाख़ों पर नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे बहुत
Read Moreजिस्म दमकता, ज़ुल्फ़ घनेरी, रंगीं लब, आँखें जादू संग-ए-मरमर, ऊदा बादल, सुर्ख़ शफ़क़, हैराँ आहू भिक्षु-दानी, प्यासा पानी, दरिया सागर,
Read Moreकोई शेर कहूँ या दुनिया के किसी मोजुं पर में कोई नया मजमून पढूं या कोई अनोखी बात सुनूँ कोई
Read Moreशहर के दुकाँदारो, कारोबार-ए-उलफ़त में सूद क्या ज़ियाँ क्या है, तुम न जान पाओगे दिल के दाम कितने हैं, ख़्वाब
Read Moreसच ये है बेकार हमें ग़म होता है जो चाहा था दुनिया में कम होता है ढलता सूरज फैला जंगल
Read Moreस्याह के टीले पे तनहा खड़ा वो सुनता है फ़िज़ा में गूँजती अपनी शिकस्त की आवाज़ निगाह के सामने मैदान-ए-कारज़ार
Read Moreमैं ख़ुद भी सोचता हूँ ये क्या मेरा हाल है जिस का जवाब चाहिए वो क्या सवाल है घर से
Read Moreशाम होने को है लाल सूरज समंदर में खोने को है और उसके परे कुछ परिन्दे क़तारें बनाए उन्हीं जंगलों
Read Moreमै पा सका न कभी इस खलीस से छुटकारा वो मुझसे जीत भी सकता था जाने क्यों हारा बरस के
Read Moreये तसल्ली है कि हैं नाशाद सब मैं अकेला ही नहीं बरबाद सब सब की ख़ातिर हैं यहाँ सब अजनबी
Read Moreदर्द बेरहम है जल्लाद है दर्द दर्द कुछ कहता नहीं सुनता नहीं दर्द बस होता है दर्द का मारा हुआ
Read Moreख्याल, सांस नज़र, सोच खोलकर दे दो लबों से बोल उतारो, जुबां से आवाज़ें हथेलियों से लकीरें उतारकर दे दो
Read Moreरात में देखो झील का चेहरा किस कदर पाक, पुर्सुकुं, गमगीं कोई साया नहीं है पानी पर कोई सिलवट नहीं
Read Moreठंडी साँसे ना पालो सीने में लम्बी सांसों में सांप रहते हैं ऐसे ही एक सांस ने इक बार डस
Read Moreचौक से चलकर, मंडी से, बाज़ार से होकर लाल गली से गुज़री है कागज़ की कश्ती बारिश के लावारिस पानी
Read Moreनीले-नीले से शब के गुम्बद में तानपुरा मिला रहा है कोई एक शफ्फाफ़ काँच का दरिया जब खनक जाता है
Read More1 आओ, सारे पहन लें आईने सारे देखेंगे अपना ही चेहरा रूह? अपनी भी किसने देखी है! क्या पता कब,
Read Moreमेरे कपड़ों में टंगा है तेरा ख़ुश-रंग लिबास! घर पे धोता हूँ हर बार उसे और सुखा के फिर से
Read Moreदिल ढूँढता है, फिर वही फुरसत के रात दिन बैठे रहे तसव्वुर-ए-जाना किये हुए जाड़ों की नर्म धुप और आँगन
Read Moreगोल फूला हुआ ग़ुब्बारा थक कर एक नुकीली पहाड़ी यूँ जाके टिका है जैसे ऊँगली पे मदारी ने उठा रक्खा
Read Moreबस्ता फ़ेंक के लोची भागा रोशनआरा बाग़ की जानिब चिल्लाता: ‘चल गुड्डी चल’ पक्के जामुन टपकेंगे’ आँगन की रस्सी से
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