Faiz Ahmed Faiz – Raqeeb Se
आ, के वाबस्तः हैं उस हुस्न की यादें तुझ से जिसने इस दिल को परीखानः बना रखा था जिसकी उल्फ़त
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आ, के वाबस्तः हैं उस हुस्न की यादें तुझ से जिसने इस दिल को परीखानः बना रखा था जिसकी उल्फ़त
Read More(अपनी बेटी ज़ोया के नाम) ये जीवन इक राह नहीं इक दोराहा है पहला रस्ता बहुत सरल है इसमें कोई
Read Moreफिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहीं राहरौ होगा, कहीं और चला जायेगा ढल चुकी रात, बिखरने लगा तारों का
Read Moreमुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ
Read Moreचन्द रोज़ और मिरी जान फ़कत चन्द ही रोज़ ज़ुल्म की छांव में दम लेने पे मज़बूर हैं हम और
Read Moreमेरे दिल में उतर गया सूरज तीरगी में निखर गया सूरज दर्स देकर हमें उजाले का खुद अँधेरे के घर
Read Moreआयो कि मरगे-सोज़े-मुहब्बत मनायें हम आयो कि हुस्न-ए-माह से दिल को जलायें हम ख़ुश हों फ़िराके-कामतो-रुख़सारे-यार से सरवो-गुलो-समन से नज़र
Read Moreये वक़्त क्या है? ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है ये जब न गुज़रा था, तब
Read Moreये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते कि बख़शा गया जिनको ज़ौके-गदाई ज़माने की फिटकार सरमाया इनका जहां-भर की धुतकार इनकी
Read Moreदर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं ज़ख़्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं रास्ता
Read Moreआया हमारे देस में इक ख़ुशनवा फ़कीर आया और अपनी धुन में ग़ज़लख़वां गुज़र गया सुनसान राहें ख़ल्क से आबाद
Read Moreग़म बिकते हैं बाजारों में ग़म काफी महंगे बिकते हैं लहजे की दूकान अगर चल जाये तो जज्बे के गाहक
Read Moreबोल कि लब आज़ाद हैं तेरे बोल, जबां अब तक तेरी है तेरा सुतवां जिस्म है तेरा बोल कि जां
Read Moreफिरते हैं कब से दर-ब-दर अब इस नगर अब उस नगर इक दूसरे के हम-सफ़र मैं और मिरी आवारगी ना-आश्ना
Read Moreएक पत्थर की अधूरी मूरत चंद तांबें के पुराने सिक्के काली चांदी के अजब जेवर और कई कांसे के टूटे
Read Moreगुल हुई जाती है अफ़्सुर्दा सुलगती हुई शाम धुल के निकलेगी अभी चश्मा-ए महताब से रात और मुश्ताक़ निगाहों से
Read Moreमैं भूल जाऊँ तुम्हें अब यही मुनासिब है मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ कि तुम तो फिर
Read Moreदिल के ऐवाँ में लिए गुमशुदा शम्मा’ओं की क़तार नूरे-ख़ुर्शीद से सहमे हुए, उकताए हुए हुस्ने-महबूब के सइयाल तसव्वुर की
Read Moreआओ और ना सोचो सोच के क्या पाओगे जितना भी समझे हो उतना पछताए हो जितना भी समझोगे उतना पछताओगे
Read Moreएक अफ़सुरदा शाहराह है दराज़ दूर उफ़क पर नज़र जमाये हुए सर्द मिट्टी के अपने सीने के सुरमगी हुस्न को
Read Moreपिन्दार के ख़ूगर को नाकाम भी देखोगे आग़ाज़ से वाकिफ़ हो अंजाम भी देखोगे रंगीनी-ए-दुनिया से मायूस-सा हो जाना दुखता
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