Gulzar – Iss mod se jaate hain
इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते कुछ तेज कदम राहें। पत्थर की हवेली को शीशे के घरौंदों
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इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त कदम रस्ते कुछ तेज कदम राहें। पत्थर की हवेली को शीशे के घरौंदों
Read Moreग़म होते हैं जहाँ ज़ेहानत होती है दुनिया में हर शय की क़ीमत होती है अक्सर वो कहते हैं वो
Read Moreहम दोनों जो हर्फ़ थे हम इक रोज़ मिले इक लफ़्ज़ बना और हम ने इक मअ’नी पाए फिर जाने
Read More1. रात को अक्सर होता है,परवाने आकर, टेबल लैम्प के गिर्द इकट्ठे हो जाते हैं सुनते हैं,सर धुनते हैं सुन
Read Moreवफ़ा-ए-वा’दः नहीं, वा’दः-ए-दिगर भी नहीं वो मुझसे रूठे तो थे, लेकिन इस क़दर भी नहीं बरस रही है हरीमे-हवस मे
Read Moreकंधे झुक जाते हैं जब बोझ से इस लम्बे सफ़र के हांफ जाता हूँ मैं जब चढ़ते हुए तेज चढाने
Read Moreकरोड़ों चेहरे और उन के पीछे करोड़ों चेहरे ये रास्ते हैं कि भिड़ के छत्ते ज़मीन जिस्मों से ढक गई
Read Moreख़ुदा वह वक्त न लाये कि सोगवार हो तू सुकूं की नींद तुझे भी हराम हो जाये तिरी मसर्रत-ए-पैहम तमाम
Read Moreखाली डिब्बा है फ़क़त, खोला हुआ चीरा हुआ यूँ ही दीवारों से भिड़ता हुआ, टकराता हुआ बेवजह सड़कों पे बिखरा
Read Moreहमसे दिलचस्प कभी सच्चे नहीं होते हैं अच्छे लगते है मगर अच्छे नहीं होते हैं चाँद में दुनिया और बुजुर्गो
Read Moreवो अह्दे-ग़म की काहिशहा-ए-बेहासिल को क्या समझे जो उनकी मुख़्तसर रूदाद भी सब्र-आज़मा समझे यहाँ वाबस्तगी, वाँ बरहमी , क्या
Read Moreअपनी मर्ज़ी से तो मज़हब भी नहीं उस ने चुना था उस का मज़हब था जो माँ बाप से ही
Read Moreमैं अक्सर सोचता हूँ ज़ेहन की तारीक गलियों में दहकता और पिघलता धीरे धीरे आगे बढ़ता ग़म का ये लावा
Read Moreराज़े-उल्फ़त छुपा के देख लिया दिल बहुत कुछ जला के देख लिया और क्या देखने को बाक़ी है आप से
Read Moreफिर लौटा है ख़ुरशीदे-जहाँताब सफ़र से फिर नूरे-सहर दस्तो-गरेबाँ है सहर से फिर आग भड़कने लगी हर साज़े-तरब से फिर
Read Moreदिल का हर दर्द खो गया जैसे मैं तो पत्थर का हो गया जैसे दाग बाक़ी नहीं कि नक़्श कहूँ
Read Moreघर में बैठे हुए क्या लिखते हो बाहर निकलो देखो क्या हाल है दुनिया का ये क्या आलम है सूनी
Read Moreदिल वो सह्रा था कि जिस सह्रा में हसरतें रेत के टीलों की तरह रहती थीं जब हवादिस की हवा
Read Moreमैं कब से कितना हूँ तन्हा तुझे पता भी नहीं तिरा तो कोई ख़ुदा है मिरा ख़ुदा भी नहीं कभी
Read Moreगलियाँ और गलियों में गलियाँ छोटे घर नीचे दरवाज़े टाट के पर्दे मैली बदरंगी दीवारें दीवारों से सर टकराती कोई
Read Moreये मुझसे पूछते हैं चारागर क्यों कि तू ज़िंदा तो है अब तक, मगर क्यों जो रस्ता छोड़के मैं जा
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