Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Shaayar log


शायर लोग

(कफ़काज के शायर कासिन कुली से माखूज़)

हर-इक दौर में, हर ज़माने में हम
ज़हर पीते रहे, गीत गाते रहे
जान देते रहे ज़िन्दगी के लिए
साअते-वस्ल की सरख़ुशी के लिए
दीन-ओ-दुनिया की दौलत लुटाते रहे
फ़करो-फ़ाका का तोशा संभाले हुए
जो भी रस्ता चुना उस पे चलते रहे
माल वाले हिकारत से तकते रहे
तान करते रहे हाथ मलते रहे
हमने उन पर किया हर्फ़े-हक संगज़न
जिन की हैबत से दुनिया लरज़ती रही
जिन पे आंसू बहाने को कोई न था
अपनी आंख उनके ग़म में बरसती रही
सबसे ओझल हुए हुक़्मे-हाकिम पे हम
कैदख़ाने सहे ताज़याने सहे
लोग सुनते रहे साज़े-दिल की सदा
अपने नग़मे सलाख़ों से छनते रहे
ख़ूंचकां दहर का ख़ूंचकां आईना
दुख भरी ख़लक का दुख भरा दिल हैं हम
तबए-शायर हैं जंगाहे-अदलो-सितम
मुनसिफ़े-ख़ैरो-शर हक्को-बातिल हैं हम

(साअते-वस्ल=मिलाप की घड़ी, सरख़ुशी=
मसती की अंतिम हद, फ़करो-फ़ाका =गरीबी
और भूख, संगज़न =पत्थर मारने वाला, हैबत=
डर, ताज़याने =कोड़े, ख़ूंचकां=ख़ून टपकना,
तबए-शायर =रूह के कवि, ख़ैरो-शर=अच्छाई
और बुराई, हक्को-बातिल=सत्य-झूठ)