Faiz Ahmed Faiz – Madah
मदह
(हसीन शहीद सुहरवरदी मरहूम ने रावलपिंडी
साजिश केस में मुलज़िमों की जानिब से वकालत
की थी। मुकद्दमे के ख़ात्मे पर उनहें यह सिपासनामा
पेश किया गया)”> किस तरह बयां हो तिरा पैराया-ए-तकरीर
गोया सरे-बातिल पे चमकने लगी शमशीर
वो ज़ोर है इक लफ़्ज़ इधर नुतक से निकला
वां सीना-ए-अग़ियार में पैवस्त हुए तीर
गर्मी भी है ठंडक भी रवानी भी सुकूं भी
तासीर का क्या कहिये, है तासीर-सी तासीर
एजाज़ उसी का है कि अरबाबे-सितम की
अब तक कोई अंजाम को पहुंची नहीं तदबीर
इतराफ़े-वतन में हुआ हक बात का शोहरा
हर एक जगह मकरो-रिया की हुई तशहीर
रौशन हुए उम्मीद से रुख़ अहले-वफ़ा के
पेशानी-ए-आदा पे सियाही हुई तहरीर
हुररीयते-आदम की रहे सख़्त के रहगीर
ख़ातिर में नहीं लाते ख़्याले-दमे-ताज़ीर
कुछ नंग नहीं रंजे-असीरी कि पुराना
मर्दाने-सफ़ाकेश से है रिश्ता-ए-ज़ंजीर
कब दबदबा-ए-जबर से दबते हैं कि जिनके
ईमान-ओ-यकीं दिल में किये रहते हैं तनवीर
मालूम है इनको कि रिहा होगी किसी दिन
ज़ालिम के गरां हाथ से मज़लूम की तकदीर
आख़िर को सरअफ़राज़ हुआ करते हैं अहरार
आख़िर को गिरा करती है हर जौर की तामीर
हर दौर में सर होते हैं कसरे-जमो-दार
हर अहद में दीवारे-सितम होती है तसख़ीर
हर दौर मैं मलऊन शकावत है शिमर की
हर अहद में मसऊद है कुर्बानी-ए-शब्बीर
करता है कल्म अपने लबो-नुतक की ततहीर
पहुंची है सरे-हर्फ़ दुआ अब मिरी तहरीर
हर काम में बरकत हो हर इक कौल में कूवत
हर गाम पे हो मंज़िले-मकसूद कदमगीर
हर लहज़ा तेरा ताली-ए-इकबाल सिवा हो
हर लहज़ा मददगार हो तदबीर की तकदीर
हर बात हो मकबूल, हर इक बोल हो बाला
कुछ और भी रौनक में बढ़े शोला-ए-तकरीर
हर दिन हो तेरा लुत्फ़े-ज़बां और ज़ियादा
अल्लाह करे ज़ोरे-बयां और ज़ियादा
शैली, सरे-बातिल=झूठ के सिर, नुतक=बोल,
अग़ियार=विरोधी, एजाज़=चमत्कार, इतराफ़े-
वतन=सारे देश में, मकरो-रिया=धोखा और
पाखंड, तशहीर=निंदा, पेशानी-ए-आदा=दुश्मन
के चेहरे पर, हुररीयते-आदम =मानवीय आज़ादी,
ख़्याले-दमे-ताज़ीर=दंड के समय का ध्यान,
नंग=शर्म, रंजे-असीरी=कैद का फ़िकर, मर्दाने-
सफ़ाकेश=पवित्र रूह, तनवीर=रौशन, सरअफ़राज़=
ऊँचा सिर, अहरार=आज़ाद लोग, जौर=जुल्म, कसरे-
जमो-दार=जमशेद की शानदार इमारतें, अहद=युग,
तसख़ीर=ढहना, मलऊन=दुष्ट, शकावत=
जालम, शिमर=हज़रत इमाम हुसैन का कातिल,
मसऊद=शुभ, ततहीर=पवित्रता)