Hindi Poetry

Gulzar – Uljhan


उलझन

एक पशेमानी रहती है
उलझन और गिरानी भी..
आओ फिर से लड़कर देंखें
शायद इससे बेहतर कोई
और सबब मिल जाए हमको
फिर से अलग हो जाने का!!