Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Ghar hmara jo na rote bhi toh veeran hota


घर हमारा जो न रोते भी तो वीरां होता
बहर गर बहर न होता तो बयाबां होता

तंगी-ए-दिल का गिला क्या ये वो काफ़िर दिल है
कि अगर तंग न होता तो परेशां होता

वादे-यक उम्र-वराय बार तो देता बारे
काश रिज़वां ही दरे-यार का दरबां होता