Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Kyon kar uss butt se rakhu jaan aziz


कयोंकर उस बुत से रखूं जान अज़ीज़
क्या नहीं है मुझे ईमान अज़ीज़

दिल से निकला प न निकला दिल से
है तेरे तीर का पैकान अज़ीज़
ताब लाये ही बनेगी ”ग़लिब”
बाक्या सख़त है और जान अज़ीज़