Mirza Ghalib – Masjid ke jer ae saya khrabat chahiye
मसजिद के ज़ेर-ए-साया ख़राबात चाहिये
भौं पास आंख किबला-ए-हाजात चाहिये
आशिक हुए हैं आप भी एक और शख़स पर
आख़िर सितम की कुछ तो मुकाफ़ात चाहिये
दे दाद ऐ फ़लक दिल-ए-हसरत-परसत की
हां कुछ न कुछ तलाफ़ी-ए-माफ़ात चाहिये
सीखे हैं मह-रुख़ों के लिए हम मुसव्वरी
तकरीब कुछ तो बहर-ए-मुलाकात चाहिये
मय से ग़रज़ नशात है किस रु-सियाह को
इक-गूना बे-ख़ुदी मुझे दिन रात चाहिये
है रंग-ए-लाला-ओ-गुल-ओ-नसरीं जुदा जुदा
हर रंग में बहार का इसबात चाहिये
सर पा-ए-ख़ुम पे चाहिये हंगाम-ए-बे-ख़ुदी
रू सू-ए-किबला वकत-ए-मुनाजात चाहिये
यानी ब-हसब-ए-गरिदश-ए-पैमान-ए-सिफ़ात
आरिफ़ हमेशा मसत-ए-मय-ए-ज़ात चाहिये
नशव-ओ-नुमा है असल से ”ग़ालिब” फ़ुरू को
ख़ामोशी ही से निकले है जो बात चाहिये