Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Mehram nahi hai tu


महरम नहीं है तू ही नवा-हाए-राज़ का
यां वरना जो हिजाब है, परदा है साज़ का

रंगे-शिकसता सुबहे-बहारे-नज़ारा है
ये वकत है शुगुफ़तने-गुल-हाए-नाज़ का

तू, और सू-ए-ग़ैर नज़र-हाए तेज़-तेज़
मैं, और दुख तेरी मिज़गां-हाए-दराज़ का

सरफ़ा है ज़बते-आह में मेरा, वगरना मैं
तोअमा हूं एक ही नफ़से-जां-गुदाज़ का

हैं बस कि जोशे-बादा से शीशे उछल रहे
हर गोशा-ए-बिसात है सर शीशा-बाज़ का

काविश का दिल करे है तकाज़ा कि है हनूज़

नाख़ुन पे करज़ इस गिरहे-नीम-बाज़ का

ताराज-ए-काविशे-ग़मे-हजरां हुआ ”असद”

सीना, कि था दफ़ीना-ए-गुहर-हाए-राज़ का